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वृन्दावन धाम को वास भलो
 
 

“वृन्दावन धाम को वास भलो जहाँ पास बहे यमुना जल पानी,

 जो जन नहाये के ध्यान करे, वैकुंठ मिले तिनको राजधानी

वेद पुराण बखान करे और संतमुनि गुणी मनमानी

यमुना यमदूत टारत है, भव तारक है श्री राधिका रानी ”

 

 

   "ब्रजलीला रस भावै अब तौ, श्रीगिरिराज अंकमें रहिये

        करिये बिनय निहोरि भाँति बहु, स्यामरूप मृदु माधुरि लहिये

          चलिये संग रसिक भक्तनके, प्रेम प्रवाह मगन ह्वै बहिये

          गाय गुबिंद नाम गुन कीर्तन, जनम जनमके तहँ"

 

 

                       "वृन्दावन सुन्दर महा, सब सुखमां की खान, रतन जटित मंदिर जहाँ शोभित जीवन प्राण 
                         वृन्दावन छबि कहा कहूँ यमुना जल चहुँ ओर, पद्मलता अरूबेली द्रुम छाजत हैं हर ठौर 
                        शोभित लता सुहावनी कदम वृक्ष जहाँ, ताहिं पुष्प वाटिका सघन बन त्रिभुवन पटतर नाहिं 
                        वृन्दावन के वास हित सुर तरसत निशि भोर कदम कुञ्ज छाया तरे राजत युगल किशोर 
                         वृन्दावन छबि वरनते हारे सहस्त्र मुख शेष, पावें दर्शन रूप धरि "सखी", अजेन्द्र महेश 
                       उ़दर भरूँ टुक माँग के जग नाते छुट जाएँ सखी, वास ब्रिज मिलै पर बिन भागन को पायें 
                           वंशी वट यमुना निकट सुन्दर धीर समीर, विहरत जहाँ नित युगल वर गोरी श्याम 

                   शरीर घाट बाट कुञ्ज गलिन की छबि को सके बखान, भोरें ही मग रोक के ठाढे चतुर सुजान" 

 

"जय जय श्री राधे"


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!! जय जय श्री राधे !!
 
 
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